अब हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस या आई का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है. इंटरनेट पर किसी सवाल का जवाब या जानकारी ढ़ूंढनी हो, ईमेल लिखना हो या कोई गाना सुनना हो, इन सभी में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल हो रहा है. हमारा कंप्यूटर इसी के आधार पर एलगोरिथम के ज़रिए हमें फ़ौरन जानकारी दे देता है. इससे हमारा काम आसान ज़रूर हो जाता है लेकिन क्या हम इस पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर होते जा रहे हैं? क्या ये हमारी सोचने की क्षमता कमज़ोर कर रहा है? क्या हमारा आत्मविश्वास भी कम होता जा रहा है? इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमारी समीक्षात्मक सोच यानि क्रिटिकल थिंकिंग की क्षमता को नष्ट कर रहा है?